नर्मदा सेवा यात्रा

“नमामि देवि नर्मदे”

नर्मदा सेवा यात्रा मॉ नर्मदा नदी के उदगम स्थल अमरकंटक से दिनांक 11 दिसम्बर 2016 से प्रारंभ होकर अलीराजपुर के सोण्डवा से वापस होते हुये अमरकंटक में दिनांक 15 मई 2017 को 148 दिवसीय यात्रा का समापन होगा। यात्रा दक्षिणी तट पर 1831 किलोमीटर एवं उत्तरीि तट 1513 किलो मीटर की रहेगी। यात्रा दक्षिणी तट पर 548 ग्रामों/कस्बों एवं उत्तरीए तट पर 556 ग्रामों/कस्बों, कुल 1104 ग्रामों/कस्बों से होकर निकलेगी।

नर्मदा सेवा यात्रा का उदेश्य

  1. नर्मदा नदी के संरक्षण एवं नदी में उपलब्धए संसाधनों एवं समुचित उपयोग हेतु जन जागरण।
  2. नर्मदा नदी के तटीय क्षेत्रों में वानस्पतिक आच्छादन बढ़ाने एवं मृदा क्षरण को रोकने हेतु वृहद स्तर पर पौधरोपण।
  3. नदी की पारिस्थितिकीय में सुधार हेतु गतिविधियों का चिन्हांकन एवं उनके क्रियान्वयन में स्थानीय जन समुदाय की जिम्मेदारी तय करना।
  4. टिकाऊ एवं पर्यावरण हितेषी कृषि पद्दतियो को अपनाने हेतु जन-जागरण।
  5. नदी में प्रदूषण के विभिन्न कारकों की पहचान एवं उनकी रोकथाम हेतु उपाय व जन-जागरण।
  6. नदी के जलभरण क्षेत्र में जल संग्रहण हेतु उपाय एवं जन-जागरूकता।

माँ नर्मदा के महत्व को सभी जानते हैं। मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा सिर्फ एक नदी नहीं बल्कि अपने आप में सम्पूर्ण सभ्यता और संस्कृति है। इस दिव्य और रहस्यमयी नदी की महिमा वेदों तक ने गायी है। युगों-युगों से हमारी माटी को अपने अमृत-जल से सोना उपजाने योग्य बनाने और हमारे शुष्क कंठों की प्यास बुझाने वाली इस पवित्रतम नदी को हम युगों-युगों से पूजते आये हैं। मैकल पर्वत के अमरकंटक शिखर से निकली यह नदी शिव की प्रिय है। इस नदी के तट पर अनेक तीर्थ-स्थल हैं ,जहाँ युगों-युगों से साधकों ने तपस्या और भक्ति से परमतत्व का अनुभव किया। इसके किनारे बसे गाँव सुखी और समृद्ध हुये। संत के हृदय जैसे इसके निर्मल जल की लहरों में अठखेलियां करते मेरा भी बचपन बीता।

यात्रा के दौरान नर्मदा नदी के संरक्षण हेतु जन जागरूकता एवं आवश्यक कार्यवाही की जायेगी। यात्रा समाज को जागरूक एवं गतिशील करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगी, जिससे यात्रा के अंतर्गत निर्धारित किये गये उद्देश्यों की पूर्ति की जा सकेगी। यात्रा के माध्यम से विभिन्न संस्थानों/व्यक्तियों को इस यात्रा से जुड़कर नर्मदा नदी के संरक्षण में सहयोग करने हेतु अवसर प्रदान किया जायेगा।

माननीय मुख्यमत्री के शब्दों सेहमारी संस्कृति में जल को देवता और नदियों को माँ की सर्वोच्च प्रतिष्ठा प्राप्त है। जल को जीवन की संज्ञा देकर उसके संरक्षण को अत्यधिक महत्व दिया गया है।

आधुनिक युग में भौतिक विकास की अंधी दौड़ में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में हमने जिस तरह के अविवेक का परिचय दिया है, उसके चलते जल सहित सभी संसाधनों के अभाव और उनके प्रदूषण का घोर संकट हमारे सामने खड़ा हो गया है। जल के मामले में तो स्थिति बहुत विकट हो गयी है। हमारी संस्कृति में जलाशयों को दूषित करना घोरतम पापों की श्रेणी में रखा गया है।

जल संरक्षण का काम सरकार, किसी एक संस्था अथवा व्यक्ति द्वारा अकेले किया जाना संभव नहीं है। यह सबका सामूहिक दायित्व और परम कर्तव्य है। जल संरक्षण एक संस्कार है, जिसे पुनर्जीवित करना आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है। जल और उसके स्रोतों की शुद्धता बनाए रखना और उनका संरक्षण करना जीवनशैली का अभिन्न अंग होना चाहिए। बच्चे-बच्चे में यह संस्कार विकसित करना होगा।

इसी महती उद्देश्य की पूर्ति की दिशा में समाज को जागरूक करने और जीवनदायी माँ नर्मदा के संरक्षण के महान यज्ञ में जन-जन की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए 11 नवंबर 2016 देव प्रबोधनी एकादशी से नर्मदा संरक्षण यात्रा का आयोजन किया जा रहा है।

आज नदी को शुद्ध रखने वाले विभिन्न कारकों में असंतुलन के चलते नर्मदा के संरक्षण की आवश्यकता को महसूस किया गया। इसके लिए मध्यप्रदेश शासन ने नमामि देवि नर्मदे, नाम से एक विशेष यात्रा चलाने की योजना बनायी है। इसका उद्देश्य नर्मदा के संरक्षण एवं इसके संसाधनों के समुचित उपयोग के प्रति जन-जागरण करना है। यात्रा के दौरान नदी के तटीय क्षेत्रों में वानस्पतिक आच्छादन को बढ़ाया जाएगा और मृदा क्षरण को रोकने के लिए बड़े स्तर पर पौधारोपण किया जाएगा। नर्मदा नदी की पारिस्थितिकी में सुधार की गतिविधियों का निर्धारण कर उनके क्रियान्वयन में स्थानीय जन-समुदाय की जिम्मेदारी तय की जाएगी। टिकाऊ और जैविक कृषि पद्धतियों के विषय में जनजागरण किया जाएगा। नदी में प्रदूषण के विभिन्न कारकों की पहचान कर उनकी रोकथाम के लिए जन-चेतना बढ़ायी जाएगी। नदी के जलभरण क्षेत्र में जल संग्रहण के लिए उपाय किये जाएंगे और इस विषय में भी लोगों को जागृत किया जाएगा।

आइये, युगों-युगों से हमें जीवन, सुख-समृद्धि तथा परम आध्यात्मिक अनुभव कराने वाली अपनी माँ नर्मदा के संरक्षण की गतिविधियों में हम सब मिलकर सक्रिय रूप से भागीदारी कर अपना जीवन सार्थक करें। इसमें हमारा और हमारी भावी पीढि़यों का भी कल्याण निहित है।