जय ज्वालेश्वर धाम

By | June 4, 2017

नर्मदा मंदिर से कोई आठ किलोमीटर दूर जलेश्वर महादेव मंदिर है। यहीं से अमरकंटक की तीसरी नदी जोहिला नदी की उत्‍पत्ति होती है। विंध्य-वैभव के अनुसार यह शिव लिंग भगवान शंकर ने स्वयं स्थापित किया था। जिससे इसको महा-रूद्र मेरू भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार इन्हीं विशेष अध्यात्मिक गुणों के कारण भगवान शिव, देवी पार्वती के साथ यहां वास करते थे।मंदिर के निकट की ओर सनसेट प्‍वाइंट है।

प्रचलित कथा – इन श्रेष्ट मुनियों की बात सुनकर महाभाग श्री सूत जी ने मुनियों से कहा तुम्हारे इस विचार को सुनकर मुझे बहुत ही प्रसन्न्ता हुई| इस कथा को कहने, सुनने, जानने से भक्तों की अभिलाषा पूर्ण होती है| ताकि और यहा तक की,इन शिवजी के सेवन से शिव सामुज्य की प्राप्ति होती है| कहते है की , सतयुग मे तारकासुर नाम राक्षस था| उसके तीन पुत्र हुये, जिसका नाम क्रमशः तारकाक्ष, कमलाकक्ष एवं बिंदमालि था| उन्होने अपने पिता तारकासुर से बोले की हमारे लिए तीन पुर की व्यवस्था कर देने यानि तीन गाव की और ये नगरे धातुओ का हो, क्रमश लोहा स्वर्ण और रजत का ये तीन नगर तीन दिशा मे हो-पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशा मे हों| एक नगर से एक नगर की दूरी चार-चार सौ योजन की दूरी पर हो| और ये स्व-चालित होवे | जब कभी ये घुमावदार एक ही दिशा मे होवे तो तब जाने की इनका विनाश का समय आ गया है | इन पुत्रों की बात सुनकर तारकासुर तपस्या मे लिन हो हुआ| इसकी तपस्या को देखकर ब्रम्हा जी बहुत प्रसन्न हुये और तरकासुर से बोले, “ भक्त तुम्हारे तपस्या से बहुत प्रसन्न हूँ| तुम वरदान मांगों” तारकासुर ने कहा, प्रभु मेरे ऐसे तीन पुर की रचना कर दो की जो अंतरिक्ष मे हो एक नगर लोहे का , दूसरा नगर सोने का और तीसरा नगर चाँदी का हो | ब्रम्हा जी एवमस्तु बोले| दूसरा वरदान तारकासुर मांगते है की मेरे नगरों के बीच में एक सरोवर हो जो की , अमृत से भरा हो| तीसरा वरदान यह मांगता है की , मैं अमर हो जाऊ , मेरी मृत्यु कभी न हो| ब्रह्मा जी ने कहा, “तारकासुर , जिसने जनम लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है” अथवा यह वर देना असंभव है |

तारकासुर भी निराश होकर भगवान भूत भावन भोलेनाथ की तपस्या से औढ़रदानी शिव जी को प्रसन्न किया और उनसे यह वरदान उन्मादों से उन्मक्त तारकासुर देवलोक पर चढ़ाई कर भोले-भाले देवतावों को परास्त किया|पराजित करने के बाद उनको त्रांण से व्याकुल देवता ब्रम्हा जी के शरण गए उसके पआस कोई युक्ति नही थी| विष्णु जी कए पास गए, वो भी असमर्थ प्रकट किए| कम बनते ण देखकर ब्रम्हा, विष्णु जी ने और देवतावों ने मिलकर भगवान शिव जी के पास गए तब शिव जी ने इंका रहस्य बताया की , देवतावों तारका सुर के पास एक हजार पत्नी है , यए सब पति धर्म का पालन कर रही है|  जअब तक ये पतिव्रता धआरएम से पदच्युत नही होगी, इसका वध नही हो सकता | “ये कम ब्रम्हा जी नारद जी को सौपा” नारद जी तरका सुर की राजधानी गए | माया मे भ्रमितकर असत्य इत्यादि बोलवाकर तारका सुर की पत्नियों को धर्म नष्ट करवा दिये | तब तक सती का दूसरा शरीर हिमांचल के यहा शैलपुत्री अथवा पार्वती के नाम से उत्पन्न हुआ| अब इन्ही देवतावों की महती उद्देश्य की पूर्ति के लिए और देवतावों की उपस्थिती मे भगवान शिव और पार्वती पुनः पाणिग्रहण संस्कार हुआ| इसी पाणिग्रहण संस्कार के दौरान भगवान शिव- पार्वती के संस्कार से स्वमी कार्तिकेय का जन्म हुआ| जब देवतावों को यह बात मालूम हुआ की तारका सुर की पत्नीया अपने सतीत्व खो चुकी है | और भगवान शिव पार्वती के योग क्रिया से स्वामी कार्तिकेय का जन्म हुआ है, तो ये पुनः ब्रह्मा विष्णु दएवता आदि सब मिलकर पुनः भगवान शंकर के कैलाश पर्वत पाहुचकर इस लोगो ने तपस्या किया | इस तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न होकर देवतावों को दर्शन दिया और अनेक कारण पूछा तब ब्रह्मा ने भूत भावन सम्राट शिव जी से कहा की “ हे नाथ तारका सुर के त्रांण से देवता अत्यंत व्याकुल है और तारका सुर को मारने का पूर्ण विधान बन चुका है यथाशीघ्र कीजिये” इस बात को सुन कर भगवान शिव मुस्कुराए की , ब्राह्मण तुम मुझे सम्राट कहकर संबोधित करते हो सम्राट जैसी मेरे पास कोई वस्तु नही है |

तब ब्रम्हा के आदेश पर विश्वकर्मा भगवान एक विशालकाय दिव्य रथ तैयार किया| भगवान विष्णु भी शंकर जी को एक अमोध अस्त्र और शस्त्र दिये| अब आशुतोष भगवान शंकर ने इन्ही स्वामी कार्तिकेय के नायकत्व मे तारका सुर के तीनों पुत्रों का विनाश करने के लिए उद्धत हुए और वही पहुँच कर उस शस्त्र का प्रयोग किया, तो उसे ऐसी प्रचंड आग का विस्फोट हुआ की उसके तीनों पुत्र एक साथ ध्वस्त हुए। सो उन तीनों नगरों मे से एक नगर यही गिरा जहा पर ज्वालेशवर शिवलिंग स्थित है | चुकी उस ज्वाला की अवशेष स्थिति से सृष्टि कही संतप्त न हो ऐसा जानकर ब्रह्मा जी ने भगवान शिव से कहा, “ प्रभु इस अग्नि को आप तत्काल सहंट करें ।” भगवान द्रवित होकर उस ज्वाला कओ जल के रूप में परिवर्तीत किया, वही जल-ज्वाला गंगा अर्थात जुहीला नदी के नाम से प्रसिद्ध हुआ व दो नगर भिन्न जगह गति पाए, तो यहा जन-मानस की यात्रा असंभव नजर आई, तो ब्रह्मा जी ने कहा ,“आशुतोष प्रभु जी मेरा शस्त्र झूठा समझा जा सकता है , तो इसकी व्यवस्था अन्यत्र होना चाहिए” भगवान शिव ने इसी पर्वत के श्रेन्णी में तीन स्वयमभू लिंग का प्रादुभार्व किए- 1 ज्वाला शांत होने से ज्वालेश्वर, 2 उत्तरदिशा मे कुटेश्वर और पूरब दिशा मे लोद्धेश्वर ।

आज का स्वयंभू लिंग त्रिपुर का पप्रतीक माना जाता है। और शास्त्रों में ऐसा वर्णित है, जो की भक्त इन तीनों शिवलिंग का दर्शन करेगा, मानों वह त्रिपुर का प्रदीक्षण पदे-पदे पूर्ण कर लेगा। जब सतयुग में कपिल मुनि जी तपस्या करने आए तो भगवान शिव के प्रेरना से कपिल जी के द्वारा देवतावों के सनीधया में इन तीनों स्वयंभू लिंगों का प्राण-प्रतिष्ठा की गई। यह कार्य सम्पन्न होने के बाद भगवान शिव की उपस्थिति जन समुदाय का,देवताओं या महात्माओं को अस्त्र-शस्त्र देकर अंतरध्यान हो गए। उन देवतावों को उसकी कोई अवश्यकता नही थी। इस शस्त्र का नाम पिनाक था, जिसे भगवान राम ने त्रेता युग में तोड़कर जानकी जी को जय जयमाला डलाई। इस कथा के अंतरगत एक बात बहुत महत्वपूर्ण है की , जो साधक नर्मदा जी का जल भगवान जवालेश्वर शिव को अर्पित करेगा, उसकई सर्व कामना भली-भाति पूर्ण होगी और उसे शिव सामुजया की प्राप्ति होगी।